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चंद्रपुर जिले में ताडोबा व्याघ्र परियोजना में आवारा कुत्तों पर नियंत्रण के लिए विशेष अभियान, 2271 कुत्तों की नसबंदी पूरी

चंद्रपुर जिले में ताडोबा व्याघ्र परियोजना में आवारा कुत्तों पर नियंत्रण के लिए विशेष अभियान, 2271 कुत्तों की नसबंदी पूरी
आवारा कुत्तों पर सुप्रीम कोर्ट सख्त (File Photo)

चंद्रपुर के ताडोबा-अंधारी व्याघ्र परियोजना में आवारा कुत्तों से वन्यजीवों को बचाने के लिए विशेष अभियान चल रहा है। जनवरी 2025 से अब तक 2271 कुत्तों की नसबंदी और टीकाकरण पूरा हो चुका है। पीपल फॉर एनिमल्स और वाइल्ड CER के सहयोग से चल रहे इस अभियान का लक्ष्य मार्च 2026 तक बफर क्षेत्र के 95 गांवों में सभी आवारा कुत्तों का इलाज पूरा करना है।

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Asfi Shadab
Asfi Shadab
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चंद्रपुर जिले में स्थित ताडोबा-अंधारी व्याघ्र परियोजना के आसपास के इलाकों में आवारा कुत्तों की बढ़ती संख्या और उनसे वन्यजीवों को होने वाले खतरे को देखते हुए एक बड़े अभियान की शुरुआत की गई है। यह अभियान न केवल वन्यजीवों की सुरक्षा के लिए जरूरी है बल्कि इंसानों के स्वास्थ्य के लिए भी महत्वपूर्ण साबित हो रहा है।

वन्यजीवों पर बढ़ता खतरा

ताडोबा-अंधारी व्याघ्र परियोजना के आसपास बसे गांवों में आवारा कुत्तों की संख्या लगातार बढ़ रही है। ये कुत्ते झुंड बनाकर जंगल में घुसते हैं और वन्यजीवों पर हमला करते हैं। पिछले कुछ समय में हिरण, खरगोश, मोर, लोमड़ी और छोटे पक्षियों पर हुए हमलों में कई जानवरों की मौत हो चुकी है। कुछ जानवर इन हमलों से बच भी जाते हैं, लेकिन उनमें रेबीज और डिस्टेंपर जैसी गंभीर बीमारियां फैल जाती हैं। ये बीमारियां न केवल जानवरों के लिए खतरनाक हैं बल्कि इंसानों में भी फैल सकती हैं।

व्याघ्र परियोजना के अधिकारियों ने बताया कि आवारा कुत्ते छोटे और कमजोर वन्यजीवों के लिए बड़ा खतरा बन गए हैं। जब ये कुत्ते झुंड में शिकार करते हैं तो कई बार बड़े जानवरों को भी नुकसान पहुंचा देते हैं। इससे जंगल में रहने वाले जीवों की संख्या पर भी असर पड़ रहा है।

कानूनी प्रावधान और नियम

पशु क्रूरता निवारण अधिनियम 1960 के तहत साल 2001 में पशु जन्म नियंत्रण नियम बनाए गए थे। इन नियमों में साल 2023 में संशोधन किया गया और नए पशु जन्म नियंत्रण नियम लागू किए गए। इन नियमों के अनुसार आवारा कुत्तों को मारा नहीं जा सकता, बल्कि उनकी नसबंदी करके और टीकाकरण करके उन्हें वापस उसी इलाके में छोड़ा जाता है।

राष्ट्रीय व्याघ्र संरक्षण प्राधिकरण ने भी देश की सभी व्याघ्र परियोजनाओं के लिए विशेष दिशा-निर्देश जारी किए हैं। इन दिशा-निर्देशों में कहा गया है कि परियोजना के आसपास रहने वाले आवारा कुत्तों की नसबंदी और टीकाकरण जरूर किया जाना चाहिए। इससे न केवल कुत्तों की संख्या पर नियंत्रण रहेगा बल्कि बीमारियों का फैलाव भी रुकेगा।

अभियान की पूरी जानकारी

ताडोबा-अंधारी व्याघ्र परियोजना के बफर क्षेत्र में कुल 95 गांव हैं। इन गांवों में रहने वाले लोगों के साथ-साथ बड़ी संख्या में आवारा कुत्ते भी हैं। वन्यजीवों को इन कुत्तों से बचाने के लिए एक व्यापक योजना बनाई गई है। इस योजना को सफल बनाने के लिए ताडोबा-अंधारी व्याघ्र परियोजना प्रशासन ने पीपल फॉर एनिमल्स वर्धा और वाइल्ड CER के साथ मिलकर काम करना शुरू किया है।

इस अभियान में विशेष टीम गांव-गांव जाकर आवारा कुत्तों को पकड़ती है। इन कुत्तों को पकड़ने का काम बहुत सावधानी से किया जाता है ताकि उन्हें कोई नुकसान न हो। पकड़े गए कुत्तों की पहले अच्छे से जांच की जाती है। जो कुत्ते स्वस्थ होते हैं, उनकी नसबंदी की जाती है।

नसबंदी और टीकाकरण की प्रक्रिया

नसबंदी की पूरी प्रक्रिया वैज्ञानिक तरीके से की जाती है। कुत्तों को बेहोश करके सर्जरी की जाती है। सर्जरी के बाद उन्हें कुछ दिन निगरानी में रखा जाता है। जब वे पूरी तरह ठीक हो जाते हैं, तब उन्हें वापस उसी इलाके में छोड़ दिया जाता है जहां से उन्हें पकड़ा गया था।

नसबंदी के साथ-साथ सभी कुत्तों को दो महत्वपूर्ण टीके लगाए जाते हैं। पहला टीका रेबीज के खिलाफ है जो एक जानलेवा बीमारी है। दूसरा टीका DHPPiL है जो कई तरह की बीमारियों से बचाव करता है। ये टीके न केवल कुत्तों को बल्कि उनके संपर्क में आने वाले इंसानों और जानवरों को भी सुरक्षित रखते हैं।

अब तक की उपलब्धि

यह अभियान जनवरी 2025 से शुरू हुआ था। अब तक इस अभियान में बड़ी सफलता मिली है। मार्च 2025 तक कुल 2271 कुत्तों की नसबंदी और टीकाकरण का काम पूरा हो चुका है। यह एक बड़ी उपलब्धि है क्योंकि इतने कम समय में इतने बड़े पैमाने पर काम करना आसान नहीं था।

परियोजना प्रशासन का लक्ष्य 31 मार्च 2026 तक बफर क्षेत्र के सभी गांवों में 100 प्रतिशत आवारा कुत्तों की नसबंदी और टीकाकरण पूरा करना है। इस लक्ष्य को पाने के लिए काम तेज गति से जारी है। हर दिन टीमें अलग-अलग गांवों में जाकर काम कर रही हैं।

दूरगामी फायदे

इस अभियान के कई फायदे हैं। सबसे पहला फायदा यह है कि आवारा कुत्तों की संख्या नियंत्रण में रहेगी। जब कुत्तों की नसबंदी हो जाएगी तो उनके बच्चे नहीं होंगे और धीरे-धीरे उनकी संख्या कम हो जाएगी। दूसरा बड़ा फायदा यह है कि रेबीज जैसी खतरनाक बीमारियों का फैलाव रुकेगा। जब सभी कुत्तों को टीके लग जाएंगे तो वे बीमारियां नहीं फैलाएंगे।

तीसरा और सबसे जरूरी फायदा यह है कि वन्यजीवों पर हमले कम होंगे। जब कुत्तों की संख्या नियंत्रित होगी तो जंगल में उनकी घुसपैठ भी कम होगी। इससे हिरण, खरगोश, मोर और अन्य छोटे जानवर सुरक्षित रहेंगे।

अधिकारियों का कहना

ताडोबा-अंधारी व्याघ्र परियोजना के क्षेत्र निदेशक प्रभु नाथ शुक्ला ने इस अभियान की जानकारी देते हुए कहा कि यह कार्यक्रम केवल एक बार का नहीं है। यह लगातार चलने वाला अभियान है। उन्होंने कहा कि वन्यजीवों की सुरक्षा के साथ-साथ इंसानों का स्वास्थ्य भी उतना ही जरूरी है। इसलिए यह अभियान निरंतर जारी रहेगा।

उन्होंने कहा कि स्थानीय लोगों का सहयोग इस अभियान में बहुत जरूरी है। गांव के लोग जब अपने इलाके के आवारा कुत्तों की जानकारी टीम को देते हैं तो काम आसान हो जाता है। उन्होंने सभी ग्रामीणों से अपील की है कि वे इस अभियान में पूरा सहयोग करें।

आगे की योजना

परियोजना प्रशासन ने आगे की योजना भी तैयार कर ली है। अगले साल मार्च तक सभी 95 गांवों में काम पूरा करने का लक्ष्य है। इसके बाद भी नियमित रूप से निगरानी की जाएगी। अगर किसी इलाके में नए आवारा कुत्ते दिखेंगे तो उनकी भी तुरंत नसबंदी और टीकाकरण किया जाएगा।

साथ ही लोगों को जागरूक करने के लिए भी कार्यक्रम चलाए जाएंगे। गांव के लोगों को बताया जाएगा कि आवारा कुत्ते क्यों खतरनाक हैं और उनकी नसबंदी क्यों जरूरी है। जब लोग इस बात को समझेंगे तो वे खुद इस अभियान में मदद करेंगे।

यह अभियान एक उदाहरण है कि कैसे वन्यजीव संरक्षण और पशु कल्याण दोनों साथ-साथ चल सकते हैं। बिना किसी जानवर को नुकसान पहुंचाए समस्या का हल निकाला जा रहा है। यह काम पूरे देश के लिए एक मिसाल बन सकता है।

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असफ़ी शादाब राष्ट्र भारत में कंटेंट एडिटर और न्यूज़ राइटर हैं। वे क्राइम, राजनीति, सरकारी योजनाओं, खेल, राष्ट्रीय एवं क्षेत्रीय घटनाओं से संबंधित समाचारों का संपादन, तथ्य सत्यापन और प्रकाशन कार्य संभालते हैं। उनकी जिम्मेदारी विभिन्न राज्यों से प्राप्त समाचारों को आधिकारिक स्रोतों, उपलब्ध दस्तावेजों और विश्वसनीय जानकारी के आधार पर व्यवस्थित एवं स्पष्ट रूप में पाठकों तक पहुंचाना है। राष्ट्र भारत में वे महाराष्ट्र, पश्चिम बंगाल, बिहार और अन्य राज्यों से प्राप्त समाचारों का संपादन करते हैं तथा उन्हें सरल, सटीक और पाठक-केंद्रित भाषा में प्रस्तुत करने का कार्य करते हैं। वे यह सुनिश्चित करते हैं कि प्रकाशित सामग्री संपादकीय मानकों, तथ्यात्मक शुद्धता और विश्वसनीय स्रोतों के अनुरूप हो। मुख्य कार्यक्षेत्र (Core Responsibilities): क्राइम, राजनीति, सरकारी योजनाओं और समसामयिक समाचारों का संपादन। विभिन्न संवाददाताओं और विश्वसनीय समाचार स्रोतों से प्राप्त सामग्री का तथ्य सत्यापन। आधिकारिक प्रेस विज्ञप्तियों, सरकारी दस्तावेजों एवं विश्वसनीय स्रोतों के आधार पर समाचारों का संपादन। स्पष्ट, संतुलित और पाठक-अनुकूल भाषा में समाचार प्रस्तुत करना। राष्ट्र भारत की संपादकीय नीतियों और पत्रकारिता मानकों के अनुरूप सामग्री प्रकाशित करना। संपादकीय दृष्टिकोण (Editorial Approach): असफ़ी शादाब का उद्देश्य पाठकों तक तथ्यात्मक, संतुलित और स्पष्ट समाचार पहुंचाना है। वे प्रकाशित होने वाली प्रत्येक सामग्री की भाषा, संदर्भ और उपलब्ध स्रोतों की समीक्षा करते हैं ताकि समाचार संपादकीय गुणवत्ता और विश्वसनीयता के मानकों पर खरा उतर सके।